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ऐसी फकीरी पर विद्रोही का नमन ….

भारतीय जनता सर्द हवाओ मे सुबह की मॉर्निंग वाक भूलकर एक नयी वॉक मे लगी हुई है, उसे बैंक वॉक या एटीम वॉक बोल सकते है| मैं मानता हूँ कि परिवर्तन से अगर देशहित हो तो इसमे कोई बुराई नही मगर कुछ विचार मेरे जेहन मे आते है| प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गत 08 नवंबर को घोषित नोटबंदी का दुष्प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार द्वारा जनता को यह आश्वासन दिया गया था कि 50 दिन में हालात सामान्य हो जाएंगे। परंतु 35 दिन बीत जाने के बावजूद अभी तक जनता को राहत मिलने की कोई किरण नजर नही आ रही है। नोटबंदी के समर्थन तथा विरोध के वक्तव्यों को दरकिनार कर केवल अर्थशास्त्रियों की बातों पर गौर किया जाए तो यही नजर आ रहा है कि प्रधानमंत्री का नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला है। यकीनन उद्योग तथा व्यापार जगत में इसके दुष्परिणाम सामने भी आने लगे हैं। डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर पड़ता जा रहा है। दूसरी तरफ नोटबंदी की घोषणा से लेकर अब तक इस विषय पर प्रधानमंत्री स्वयं अपने कई अलग-अलग बयान देते आ रहे हैं। जिस समय प्रधानमंत्री ने एक हजार व पांच सौ रुपये की प्रचलित करंसी की नोटबंदी की घोषणा की थी उस समय उनके निशाने पर भ्रष्टाचार को समाप्त करना, काले धन को बाहर लाना, आतंकवाद पर काबू पाना तथा नकली करंसी पर अंकुश लगाना मुख्य रूप से शामिल था। नोटबंदी घोषणा के बाद ही आतंकवादियों के पास से नई दो हजार की नोट बरामद की गई और सबसे बड़ी बात कि स्वयं बीजेपी के एक कार्यकर्ता तथा उसकी बहन पंजाब के मोहाली में दो हजार रुपये की नकली नोट बनाने के आरोप में गिरफ्तार हुआ जबकि दूसरा भाजपा कार्यकर्ता तमिलनाडु में लाखों रुपये की नई नोट के साथ पकड़ा गया। नोटबंदी के एक पखवाड़े के बाद सरकार ने जनता को बताना शुरु किया कि देश में कैशलेस व्यवस्था लागू होनी चाहिए, तभी काला धन व भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकेगा| फिर जब सरकार जनता के दबाव में इस निष्कर्ष पर पहुंचने लगी कि देश की बाजार व्यवस्था को पूरी तरह कैशलेस नही बनाया जा सकता, तब प्रधानमंत्री ने शब्दों का ताना-बाना रचते हुए जनता से लेस कैश व्यवस्था स्थापित करने का आह्वान कर डाला। उधर इन सारी कवायद के बीच पूरे देश के बैंकों व एटीएम में लंबी-लंबी कतारों का लगना जारी है तथा पैसों की कमी के चलते आम लोगों में हाहाकार मचा हुआ है। अब तक लगभग 85 लोग पूरे देश में इन्हीं लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी जान गंवा चुके हें। जनता की परेशानियों में इजाफा होता जा रहा है। शादी-विवाह ,पढ़ाई-लिखाई, क्रय-विक्रय, लेन-देन, वेतन, किराया-भाड़ा, डीजल-पैट्रोल, खेती-बाड़ी, बीज,खाद, दवा-इलाज तथा मजदूरी आदि सब कुछ बुरी तरह से प्रभावित हो चुका है। कुछ अर्थशास्त्रियों तथा उद्योग से जुड़े लोगों का तो यहां तक मानना है कि यदि आज ही सब कुछ सामान्य हो भी जाए फिर भी उद्योग तथा व्यापार व्यवस्था को पटरी पर आने में कम से कम 6 महीने का समय लग सकता है। परंतु प्रधानमंत्री ने इस दिशा में अपने कदम इतने आगे बढ़ा लिए हैं कि संभवतः अब स्वयं उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि इस खतरनाक स्थिति से आखिर कैसे निपटा जाए लिहाजा वे कभी जनता को शब्दों की बाजीगरी से तो कभी जनता के बीच आंसू बहाकर तो कभी अपने त्याग व फकीरी जैसी तरह-तरह की दूसरी भावनात्मक बातें सुनाकर जनता को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है देशवासियों ने इसके पहले शहंशाह रूपी फकीर पहले कभी नही देखा था। हालांकि फकीरी और झोला लेकर चला जाऊंगा जैसा वाक्य निश्चित रूप से जनता की हमदर्दी हासिल करने के लिए बोला गया परंतु राजनैतिक विशलेषकों द्वारा इस बयान को इस नजरिये से देखा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के जो कदम उठाए थे वह पूरी तरह असफल हो चुके हैं और आने वाले समय में स्थिति और अधिक खतरनाक व गंभीर होने की संभावना है। यदि देश की अर्थव्यवस्था बेकाबू हुई और सरकार इस पर नियंत्रण पाने में असफल रही तो प्रधानमंत्री स्वेच्छा से जाएं या न जाएं परंतु परिस्थितियां स्वयं ऐसी पैदा हो सकती हैं कि उन्हें सिंहासन छोड़ना भी पड़ सकता है। उच्चतम न्यायालय ने भी नोटबंदी लागू होने के फौरन बाद यह चेतावनी दे दी थी कि नोटबंदी के कारण अव्यवस्था फैलने की स्थिति में देश में दंगे-फसाद भी फैल सकते हैं। सच पूछिए तो प्रधानमंत्री की ऐसी फकीरी पर बार-बार कुर्बान जाने को दिल चाहता है।
उत्तम जैन (विद्रोही)

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