सुरत/गोडवाड ज्योती: जैन धर्म में
भगवन की केसर पूजा के लिए उत्तम से उत्तम द्रव्य के उपयोग का विधान है इसीलिए
प्राकृतिक रूप से प्राप्त उत्तम केसर, चन्दन व कपूर को प्राकृतिक रूप में ही घोटकर
भगवान की प्रतिमा को पूजा करने की प्राचीन प्रथा चली आ रही है। पर अब आधुनिकता और
बाजारीकरण की मार मूक रूप से दबे पांव मंदिरो के जिनबिम्बो पर प्रतिकूल असर दिखा
रही है। चीन और भारत की कई संस्थाओ ने केसर घोटने के लिए तीर्थस्थानों व पर्वतिथि
पर भीड़ और कतार से मुक्ति का प्रलोभन देकर रेडीमेड इंस्टेंट केसर गोलियों को बाजार
में न केवल उतारा बल्कि धडल्ले से इसकी बिक्री भी कर रही है। विडम्बना ये है कि
भक्त भी बिना किसी जाँच-पड़ताल या सोचे-समझे इन केसर की गोलियों से पूजा कर रहे हैं,
जिसकी वजह से प्रतिमाओ को भारी नुकसान हो रहा है। दरअसल इन गोलियों रासायनिक तत्व
मिले हैं, जो उच्च संगमरमर से बनी प्रतिमाओ में छेद या रंग भेद हो रहा है। पहले श्रावक
स्वद्रव्य से केसर, चन्दन, स्वच्छ ताजे फल-फूल-नेवैद्य से प्रभुपूजा आदि होती थी किन्तु
पिछले कुछ वर्षो में आधुनिकता ने समय को समेट लिया है| नतीजा अधिकतर मंदिरो में केसर
घोटने का कार्य पुजारी करते हैं| अब श्रावको के बाद पुजारी भी इतने व्यस्त और
व्यावसायिक हो गए कि केसर घोटने के लिए समय नही निकाल पाते और कभी बासी केसर तो
कभी पतली केसर में वासक्षेप मिलाकर काम निपटा लेते हैं। अब ओर व्यस्तता और दूसरी ओर
पुन्य कमाने की लालसा रखने वाले श्रावको को धार्मिक निति-नियम का भान भुला रही है।
मंदिरो की वास्तविक कार्यप्रणाली की खोज खबर लेने का समय नही और जिन्हें खबर है,
उनमे से कुछ लोगो ने इस बाजारी केसर की गोली को विकल्प बना लिया है, जिसमें रासायनिक
पदार्थ और चुना अधिक है| जिसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक जिन प्रतिमाओ को नुकसान पहुँच
रहा है| इन गोलियों के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु समस्त संघ और साधु-भगवन्तो
द्वारा जल्द ही कोई कदम उठाने की आवश्यकता है।

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