पिछले दिनों सम्मान लौटने वाले हुए वाकयों को याद करता हूँ
तो दिल में एक टिस सी उठती है कि काश! मुझे भी कोई सम्मान मिला होता तो मैं भी
लौटा पाता क्योंकि इतना चर्चित तो वें तब भी नही हुए थे, जब उन्हें सम्मान मिला
था| उससे कहीं अधिक चर्चित तो वें सम्मान लौटाकर हो गये| दोस्तों... हालाँकि मेरी
उम्र अभी सम्मान पाने जितनी नही हुई और ना ही मेरी राजनीति या सामाजिक शिखर तक कोई
पहुँच हैं लेकिन इतना तो पता ही है कि सम्मान प्राप्त करना अपने-आप में विशिष्ठ
अनुभूति है, जिसे शब्दों में नही ढाल नही सकते|
हाँ तो मैं बात कर रहा था, अपने सम्मान की
और बुद्धिजीवियों द्वारा सम्मान लौटने की| छोटे मुंह, बड़ी बात होगी लेकिन इस लेख
के माध्यम से आप सभी को सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि ‘गर आप बदलाव लाना चाहते
हैं तो स्वयं बदलिए| विरोध के और भी कई तरीके हैं| जी-तोड़ मेहनत, विशिष्ठ
उपलब्धियों व प्रयासों के बाद ही आप सभी सम्मानित होने के उस दुर्लभ अवसर को
प्राप्त करने में सफल हुए हैं तो इसे यूँ मायूस ना करें| स्वयं का नही तो कम से कम
सम्मान का तो सम्मान करें| जो परिस्थियाँ हैं, उनका डटकर मुकाबला करें| कहीं ऐसा
ना हो कि मुझ जैसी भावी पीढ़ी के मन में यह विचार घर कर जाये कि भविष्य में अगर
किन्ही परिस्थियों में हमें अपना सम्मान लौटने की नौबत आने ही वाली है तो उसे पाने
की जद्दोजहद करने की आवश्यकता क्या है? फिर तो हमारे लिए जीवन का एक ही उद्धेश्य
बचता है कि बस खाओ, पियो, मौज उड़ाओ| मेरा काम था, आप बुद्धिजीवियों को आगाह करना,
फिर ये ना कहना कि युवापीढ़ी दिशाविहीन है|
श्रेय मुणोत (लिपिबद्ध-ज्योती मुणोत)
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