*दृष्टिकोण बदलने की जरुरत*
दो मित्र थे, अलग - अलग विचारधारा थी । एक राग-रंग का शौकीन तो दूसरा सत्संग का प्रेमी । रविवार को छुट्टी का दिन दोनों साथ-साथ निकले । एक ने कहा - भले आदमी सात दिन में एक दिन छुट्टी का मिलता है, चलो संत आये हुये हैं, उनका व्याख्यान सुनने चलें । दूसरे ने कहा - व्याख्यान सुनकर क्या मिलेगा ? वहाँ तो वही बाते हैं, नाच देखने चलते हैं । दोनों को एक दूसरे की बात जंची नहीं । वे अपने - अपने स्थान पर पहुँच गये ।
अब दोनों का चिन्तन चलता है । सत्संग में बैठा व्यक्त़ि सोचता है, मेरा दोस्त नाच देख रहा होगा, संगीत का आनंद ले रहा होगा । ऐसा विपरीत सोचकर वह कर्म बंध कर रहा है । ईधर जो नाच देखने गया वह सोचता है - यह संसार स्वयं एक रंगमंच है । कोई धन के लिए तो कोई रुप, कोई तृष्णा के पीछे नाच रहा है । मेरे दोस्त ने ठीक किया वह सत्संग में भगवान की वाणी सुन रहा है । जीवन का सच्चा आनऩ्द, सच़्चा ज्ञान प्राप्त कर रहा है । वह बैठा कहाँ ? नाच - गाने में बैठा, आस़्रव का स्थान है, पर वह निर्जरा कर रहा है और जो संवर के स्थान पर बैठा है वह आस़्रव एवं बंध कर रहा है ।
आस़्रव और निर्जरा धर्मस्थान में नहीं, धर्मियों के बीच नहीं, राग-रंग में नहीं, यह तो अपनी भावना में है, दृष्टि में है ।
आगमवाणी में :-
मृगापुत्र अपने रंगमहल में बैठा है, जहाँ नृत्य हो रहा है, इन्द्रियों की तृप्ति करने वाले विषयों की पूर्ति हो रही है । झरोखे पर बैठे हुए को अचानक संत दिखते हैं । संत को देखकर चिंतन चलता है - मैंने ऐसा क्षमा - समाधि का स्वरुप देखा है । जाति स्मरण ज्ञान होता है और वैराग्य जागता है, वे शांत - दांत मुनिराज बन जाते हैं । आप भी संतों को देखते हैं, कभी किसी का चिन्तन चला क्या ?
इस मानव जीवन का सार दृष्टि बदलने में है । यह जब तक नहीं बदलेगी तब तक "पैसा" परमेश़्वर रहेगा, जायदाद जगदीश़्वर होगी, सम्पत्ति सर्वेश़्वर होगी । जब पैसे को आप साधन न मान कर साध्य मानेंगें तब भागदौड़ चलती रहेगी । किन्तु पैसा साध्य नहीं, ध्येय नहीं है । दूसरों को बदलने की चेष़्टा रहती है, लेकिन अपने विचार बदलिए तो आप "बंध" को "संवर" में परिवर्तित कर सकेंगे ।
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