उज्जैन/गोडवाड ज्योती: कुक्षी निवासी मुमुक्षु सविता जैन ने हजारों श्रावक-श्राविकाओं की मौजूदगी में सांसारिक जीवन का त्यागकर लोकसंत प.पु. श्रीमद विजय जयंतसेन सुरिश्वरजी म.सा. आदि ठाणा के पावन सानिध्य में संयम पथ अंगीकार किया। राष्ट्रसंत श्रीमद विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी ने जैसे ही मुमुक्षु सविता को दीक्षा मंत्र के साथ ओघा (चरवला) प्रदान किया तो वे अंतरमन से झूम उठी और सांसारिक चोला छोड़ने के पहले खूब नृत्य किया। फिर केशलोचन के बाद साध्वी वेश धारण किया। राष्ट्रसंत ने 43 वर्षीय मुमुक्षु सविताजी को नूतन नामकरण कर साध्वीश्री जीतयशाश्रीजी म.सा. नाम प्रदान किया|
श्री सौधर्म बृहत्तपोगच्छीय त्रिस्तुतिक जैन श्वेतांबर श्रीसंघ व राज राजेंद्र वाटिका पारमार्थिक ट्रस्ट द्वारा खाचरौद नाका स्थित राज राजेंद्र वाटिका तीर्थ परिसर के प्रांगण में सात दिवसीय दीक्षा-प्रतिष्ठा-जन्मोत्सव मनाया गया, जिसमें इस महामहोत्सव के चौथे दिवस मुमुक्षु सविता जैन का दीक्षा समारोह हुआ। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 में राष्ट्रसंत चातुर्मास के लिए कुक्षी आए थे। इनके उपदेशों से प्रेरित होकर कुक्षी निवासी सविता जैन को दीक्षा के भाव जागे थे। राष्ट्रसंत ने दीक्षा मंत्र-सूत्रों का उल्लेख कर दीक्षा विधि संपन्न कराई। राष्ट्रसंत ने मुमुक्षु का नामकरण जीतयशाश्रीजी किया तो पंडाल जिनशासन के जयकारों से गूंज उठा। राष्ट्रसंत ने साध्वीश्री जीतयशाश्रीजी को साध्वीश्री स्नेहलताश्रीजी म.सा. की शिष्या व तत्वलताश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-2 की प्रशिष्या घोषित किया। दीक्षा समापन पर श्रीसंघ ने साध्वीश्री जीतयशाश्रीजी को अक्षत से वधाया और उपकरण भेंट किए। दीक्षा महोत्सव का लाभ धर्म के माता-पिता इंदरमल दसेड़ा व राजकुमारी दसेड़ा ने लिया। इस दीक्षा प्रसंग पर राष्ट्रसंत ने धर्मसभा को उद्बोधित करते हुए कहा कि पुण्यशाली आत्मा ही संयम जीवन अंगीकार करती है। सांसारिक जीवन से ज्यादा बेहतर साधु जीवन है। संयम का वास्तविक अर्थ है अपने आप पर काबू पाना। इस मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त होता है। समारोह में मुमुक्षु के 11 परिजन का बहुमान लाभार्थी परिवार के साथ ही श्रीसंघ अध्यक्ष बाबूलाल तांतेड़, वाटिका ट्रस्ट अध्यक्ष इंदरमल दसेड़ा ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रकाश कांठेड़ ने किया। यह जानकारी मिडिया प्रभारी ब्रिजेश बोहरा-नागदा द्वारा प्राप्त हुई|
श्री सौधर्म बृहत्तपोगच्छीय त्रिस्तुतिक जैन श्वेतांबर श्रीसंघ व राज राजेंद्र वाटिका पारमार्थिक ट्रस्ट द्वारा खाचरौद नाका स्थित राज राजेंद्र वाटिका तीर्थ परिसर के प्रांगण में सात दिवसीय दीक्षा-प्रतिष्ठा-जन्मोत्सव मनाया गया, जिसमें इस महामहोत्सव के चौथे दिवस मुमुक्षु सविता जैन का दीक्षा समारोह हुआ। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 में राष्ट्रसंत चातुर्मास के लिए कुक्षी आए थे। इनके उपदेशों से प्रेरित होकर कुक्षी निवासी सविता जैन को दीक्षा के भाव जागे थे। राष्ट्रसंत ने दीक्षा मंत्र-सूत्रों का उल्लेख कर दीक्षा विधि संपन्न कराई। राष्ट्रसंत ने मुमुक्षु का नामकरण जीतयशाश्रीजी किया तो पंडाल जिनशासन के जयकारों से गूंज उठा। राष्ट्रसंत ने साध्वीश्री जीतयशाश्रीजी को साध्वीश्री स्नेहलताश्रीजी म.सा. की शिष्या व तत्वलताश्रीजी म.सा. आदि ठाणा-2 की प्रशिष्या घोषित किया। दीक्षा समापन पर श्रीसंघ ने साध्वीश्री जीतयशाश्रीजी को अक्षत से वधाया और उपकरण भेंट किए। दीक्षा महोत्सव का लाभ धर्म के माता-पिता इंदरमल दसेड़ा व राजकुमारी दसेड़ा ने लिया। इस दीक्षा प्रसंग पर राष्ट्रसंत ने धर्मसभा को उद्बोधित करते हुए कहा कि पुण्यशाली आत्मा ही संयम जीवन अंगीकार करती है। सांसारिक जीवन से ज्यादा बेहतर साधु जीवन है। संयम का वास्तविक अर्थ है अपने आप पर काबू पाना। इस मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त होता है। समारोह में मुमुक्षु के 11 परिजन का बहुमान लाभार्थी परिवार के साथ ही श्रीसंघ अध्यक्ष बाबूलाल तांतेड़, वाटिका ट्रस्ट अध्यक्ष इंदरमल दसेड़ा ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रकाश कांठेड़ ने किया। यह जानकारी मिडिया प्रभारी ब्रिजेश बोहरा-नागदा द्वारा प्राप्त हुई|

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